रांची : 26 अगस्त 2025 को झारखंड विधानसभा द्वारा पारित राज्य विश्वविद्यालय विधेयक-2025 में विश्वविद्यालयों से राज्यपाल एवं झारखंड लोक सेवा आयोग की भूमिका को समाप्त कर दी गई है। कुलपति, प्रति-कुलपति और वित्तीय सलाहकार की नियुक्त अब राज्य करेगी। विधेयक पारित होते ही राज्य भर में इसके विरुद्ध प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने इस विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए लोकतंत्र पर सीधा प्रहार बताया है। अभाविप कार्यकर्ताओं द्वारा प्रांत के सभी जिलों में राज्य सरकार के विरुद्ध आक्रोश मार्च निकालकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का पुतला फूंका गया। आक्रोशित छात्रों एवं अभाविप कार्यकर्ताओं ने कहा है कि राज्य सरकार द्वारा पारित विधेयक न केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला है, बल्कि विधेयक के माध्यम से संवैधानिक पद पर आसीन महामहिम राज्यपाल के अधिकारों में भी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी है।
संविधान में प्रदत्त राज्यपाल के अधिकारों का हनन कर रही है हेमंत सरकार : मनोज सोरेन
अभाविप झारखंड के प्रदेश मंत्री मनोज सोरेन ने कहा कि विश्वविद्यालयों में कुलपति, प्रति-कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया को भी राज्य सरकार के अधीन करना शिक्षा के साथ खिलवाड़ एवं संविधान में प्रदत्त राज्यपाल की भूमिका और अधिकारों का हनन है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक संविधान की गरिमा और न्यायिक स्वतंत्रता का अपमान है। ऐसा प्रतीत होता है कि हेमंत सरकार राज्य की उच्चतर शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से अपने अधीन कर इसे राजनीति एवं भ्रष्टाचार का अड्डा बनाना चाहती है। सरकार पहले से ही झारखंड अधिविध परिषद(जेएसी) झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग(जेएसएससी), झारखंड लोक सेवा आयोग(जेपीएससी) जैसे संस्थानों के संचालन में पूरी तरह से विफल रही है और अब विश्वविद्यालयी शिक्षा को राजनीतिक एजेंडा के तहत पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेकर काम करना चाहती है, जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
भविष्य के नेतृत्व को कुचलने का प्रयास
अभाविप ने आरोप लगाया कि सरकार इस विधेयक के माध्यम से विश्वविद्यालय परिसरों में होने वाले छात्रसंघ चुनाव की परंपरा को भी समाप्त करना चाह रही है। विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव के बजाय चयन की व्यवस्था लागू करना लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोंटना है।
अभाविप का कहना है कि वर्षों से छात्र संघ चुनावों के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक नेतृत्व उभरता रहा है, जिसने समय-समय पर लोकतंत्र को नई दिशा दी है। अब सरकार इस रास्ते को बंद कर भविष्य के नेतृत्व को कुचलने का प्रयास कर रही है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ऊपर में यह सरकार स्वयं एक ग्रहण बन चुकी है।
सरकार की नीयत और निष्पक्षता पर संदेह
अभाविप ने सरकार की नीयत पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। अभाविप का कहना है कि राज्य सरकार पहले ही झारखंड अधिविध परिषद (जेएसी), झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) एवं झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) जैसी संस्थाओं के संचालन में विफल रही है। राज्य में हुए पेपर लीक, परीक्षा रद्दीकरण, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार नियुक्तियों में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने में नाकाम रही है। यह घटनाएं इस बात का भी प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि राज्य सरकार योग्यतापूर्ण, पारदर्शी और निष्पक्षता की गारंटी नहीं दे सकती। इसलिए आयोग की भूमिका केवल शिक्षक, शिक्षकेत्तर और कर्मचारी की नियुक्ति एवं पदोन्नति तक सीमित रहनी चाहिए। कुलपति और प्रति कुलपति की नियुक्ति जैसे महत्वपूर्ण अधिकार राज्यपाल के अधीन ही रहने चाहिए।