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Home लेख

विकसित भारत के संकल्प में युवाशक्ति की भूमिका

राष्ट्रीय छात्रशक्ति by अंकित शुक्ल
January 12, 2026
in लेख

वर्तमान परिवेश में भारत का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की चेतना, कर्तव्यबोध और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। आज भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 65 प्रतिशत भाग 35 वर्ष से कम आयु का है। इनमें से अधिकांश युवा जेन–ज़ेड पीढ़ी से संबंधित हैं। यही वह पीढ़ी है, जो वर्ष 2047 तक भारत को “विकसित राष्ट्र” बनाने के संकल्प को साकार करने की क्षमता रखती है। विकसित भारत के लक्ष्य में युवाशक्ति की भूमिका केवल महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि निर्णायक है। प्रधानमंत्री के “विकसित भारत@2047” अभियान में युवाओं को परिवर्तन के सूत्रधार के रूप में देखा गया है। तकनीक, सूचना एवं प्रौद्योगिकी, नवाचार, उद्यमिता और वैश्विक दृष्टिकोण के कारण आज का युवा भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की धुरी बन सकता है। किंतु इसके लिए आवश्यक है कि युवा अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समान गंभीरता से समझें।

कर्तव्यबोध ही सशक्त नागरिकता की नींव है। राष्ट्र का उत्थान केवल अधिकारों की मांग से नहीं, बल्कि कर्तव्यों के सम्यक निर्वहन से होता है। युवा पीढ़ी के लिए यह आवश्यक है कि वह पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, सामाजिक न्याय, स्वच्छता और नागरिक अनुशासन को अपने जीवन–दर्शन का अंग बनाए। राष्ट्रनायक अटल बिहारी वाजपेयी सदैव इस बात पर बल देते थे कि अनुशासित, जागरूक और संस्कारित युवा ही देश को नई दिशा दे सकता है। देशप्रेम केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि व्यवहारिक उत्तरदायित्व का संकल्प है, जो सच्चे नागरिक धर्म का आधार बनता है।

आज का भारत तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती तकनीकें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और उद्योग के क्षेत्रों में नई संभावनाएँ खोल रही हैं। किंतु इन तकनीकों के साथ नैतिक विवेक और मानवीय संवेदनशीलता बनाए रखना युवाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। तकनीक तभी सार्थक सिद्ध होगी, जब उसका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जाए। सोशल मीडिया आज विचार–विनिमय और जन-जागरूकता का सशक्त माध्यम बन चुका है। यदि इसका प्रयोग रचनात्मक, तथ्यपरक और संवेदनशील दृष्टि से किया जाए, तो यह समाज सुधार का प्रभावी माध्यम बन सकता है। किंतु असत्य सूचना, कटुता और विभाजन फैलाने के लिए इसका उपयोग राष्ट्र की एकता और सामाजिक सौहार्द को कमजोर कर सकता है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ विवेक, संयम, शालीनता और अध्ययनशील दृष्टि का होना अनिवार्य है। सत्य और तथ्य आधारित संवाद स्थापित करने में युवाओं को अपनी भूमिका अत्यंत जिम्मेदारी से निभानी होगी। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, “युवा वह है जिसे मुस्कुराने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती।” उनका यह संदेश केवल आयु से नहीं, बल्कि सोच और कर्म से युवापन को परिभाषित करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा केवल उम्र में ही नहीं, बल्कि विचारों में भी नवीन हों और उनके कर्म सकारात्मक दिशा में प्रवाहित हों।

(लेखक, अभाविप के पूर्व राष्ट्रीय मंत्री हैं।)

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