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Home लेख

वैश्विक संकटों के युग में विवेकानंद का भारत: सांस्कृतिक चेतना और महाशक्ति की अवधारणा

राष्ट्रीय छात्रशक्ति by शैतान सिंह
January 12, 2026
in लेख
वैश्विक संकटों के युग में विवेकानंद का भारत: सांस्कृतिक चेतना और महाशक्ति की अवधारणा

आज का युवा जब पहचान, उद्देश्य और वैश्विक भूमिका की तलाश में है, तब विवेकानंद का संदेश- “उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत”- केवल व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक दायित्व का आह्वान बन जाता है। योग, भारतीय संस्कृति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के माध्यम से विवेकानंद ने जिस भारत की कल्पना की थी, वही भारत आज विश्व को शांति, संतुलन और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखा रहा है। स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में भारत एक नैतिक-आध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में है, जो आज की अस्थिर और संघर्षग्रस्त दुनिया के लिए न केवल प्रासंगिक है, बल्कि अनिवार्य भी। स्वामी विवेकानंद जी का कहना था कि  किसी राष्ट्र की असली शक्ति केवल भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक गहराई, सांस्कृतिक वैभव और नैतिक नेतृत्व क्षमता में निहित होती है। भारत, जिसकी योग, वेदांत और प्राचीन दर्शन परंपरा विश्व को सदियों से मार्गदर्शन देती रही है, आज उसी ज्ञान और संस्कृति के माध्यम से वैश्विक सह-अस्तित्व और नैतिक नेतृत्व के क्षेत्र में अग्रणी बन रहा है।

आधुनिक विश्व में असमानताएं, सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष, जलवायु संकट और बहुध्रुवीय शक्ति संतुलन जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे समय में भारत अपनी प्राचीन संस्कृति, योग और आध्यात्मिक मूल्यों को आत्मसात करके वैश्विक नैतिक महाशक्ति बन सकता है। भारत का इतिहास और संस्कृति विश्व को सिखाती है कि शक्ति केवल हथियार और धन में नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और समाज के कल्याण में निहित है। विवेकानंद की दूरदर्शिता आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि उन्होंने यह दिखाया कि यदि राष्ट्र अपने प्राचीन ज्ञान और आध्यात्मिक धरोहर को विश्व मंच पर प्रस्तुत करे, तो वह केवल एक महाशक्ति नहीं, बल्कि दुनिया के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शक बन सकता है। स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात कर भारत का वैश्विक नेतृत्व, दूसरों को अनुकरणीय मार्ग दिखाने वाला, नैतिक और सांस्कृतिक प्रेरक बन रहा है। स्वामी विवेकानंद का दर्शन स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि किसी राष्ट्र की असली शक्ति केवल सामरिक या आर्थिक सामर्थ्य तक सीमित नहीं होती। उनके अनुसार, सच्ची शक्ति नैतिकता, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों से आती है। भारत, जिसकी योग, वेदांत और प्राचीन दर्शन परंपरा विश्व को सदियों से मार्गदर्शन देती रही है, इसी दृष्टि से एक नैतिक-आध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में है। विवेकानंद ने भारत की वैश्विक भूमिका को केवल शक्ति प्रदर्शन के बजाय सांस्कृतिक समावेशिता, सहिष्णुता और आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से परिभाषित किया। उनके विचार आज के वैश्विक संदर्भ में भारत की सॉफ्ट पावर की अवधारणा के लिए मार्गदर्शक हैं। विवेकानंद का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि भारत का वैश्विक योगदान केवल भौतिक शक्ति पर आधारित नहीं, बल्कि आध्यात्मिक नेतृत्व और नैतिक उदाहरण के माध्यम से दुनिया के लिए प्रेरणा है। यही दृष्टि भारत को एक सच्ची महाशक्ति के रूप में स्थापित करती है।

योग का वैश्विक और आध्यात्मिक महत्व

योग केवल शारीरिक व्यायाम या व्यक्तिगत साधना नहीं है; यह मानव जीवन और समाज के समग्र विकास का मार्ग है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार योग के चार मुख्य मार्ग- कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और राजयोग न केवल आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शक हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान में भी योगदान देते हैं। कर्मयोग सेवा और कर्तव्य के माध्यम से, ज्ञानयोग विवेक और विचारशीलता के माध्यम से, भक्तियोग प्रेम और समर्पण के माध्यम से, तथा राजयोग ध्यान और मानसिक अनुशासन के माध्यम से मानव व्यक्तित्व को पूर्णता की ओर ले जाता है। आधुनिक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में योग ने मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन और जीवन में संतुलन को बढ़ावा दिया है। इसके माध्यम से वैश्विक शांति, सहिष्णुता और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को भी बढ़ावा मिलता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ने योग को विश्व मंच पर प्रस्तुत किया है और भारत की सॉफ्ट पावर के रूप में इसकी वैश्विक पहचान बनाई है। योग का यह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरे मानव समाज और वैश्विक समुदाय के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत है। स्वामी विवेकानंद की संस्कृति की अवधारणा केवल कला या परंपरा तक सीमित नहीं थी, यह सहिष्णुता, बहुलतावाद और नैतिक नेतृत्व पर आधारित थी। उनके अनुसार किसी भी राष्ट्र की असली महानता उसकी सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिक स्थिरता में निहित होती है। वैश्विक सह-अस्तित्व की नींव यही विचार प्रस्तुत करता है कि विविधता में एकता संभव है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और संघर्ष समाधान इसी दृष्टि से सफल हो सकता है। भारत का वैश्विक योगदान इसी दृष्टि से अद्वितीय है। हमारी प्राचीन संस्कृति, योग और वेदांत परंपरा केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए नहीं, बल्कि दुनिया में नैतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम है। शिक्षा, स्वास्थ्य, योग, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के माध्यम से भारत ने अपनी सॉफ्ट पावर स्थापित की है, जो विश्व के विभिन्न देशों और संस्कृतियों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देती है। स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि भारत का वैश्विक नेतृत्व बल और शक्ति के बजाय नैतिकता और संस्कृति पर आधारित होना चाहिए। यही दृष्टि भारत को केवल शक्ति राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व समुदाय के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शक बनाती है।

समकालीन वैश्विक संदर्भ में विवेकानंद का दृष्टिकोण

आज का विश्व गंभीर संकटों का सामना कर रहा है- वैश्विक संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। परंपरागत शक्ति संतुलन और सामरिक दबाव इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं प्रदान कर सकते। स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि सच्ची वैश्विक शक्ति मानव चेतना, नैतिकता और आध्यात्मिक नेतृत्व में निहित है। उनका संदेश था कि राष्ट्रों का वैश्विक योगदान केवल ताकत और आर्थिक प्रभुत्व तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि “सत्य और करुणा” के आधार पर नैतिक नेतृत्व प्रदान करने में होना चाहिए। इस संदर्भ में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्राचीन योग, वेदांत और भारतीय दर्शन परंपरा के माध्यम से भारत ग्लोबल साउथ का नैतिक नेतृत्व कर सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और योग जैसे क्षेत्रों में भारत का योगदान वैश्विक सह-अस्तित्व, संवाद और सहयोग को बढ़ावा देता है। विवेकानंद की दृष्टि के अनुसार, भारत का नेतृत्व केवल अपनी शक्ति दिखाने के लिए नहीं, बल्कि विश्व समुदाय में न्याय, सद्भाव और नैतिकता का उदाहरण स्थापित करने के लिए होना चाहिए। यह दृष्टिकोण न केवल भारत की महानता को पुष्ट करता है, बल्कि दुनिया के लिए स्थायी और नैतिक नेतृत्व का मार्ग भी प्रस्तुत करता है। भारत की वैश्विक पहचान केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है, इसकी असली ताकत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्य में निहित है।

योग, वेदांत और प्राचीन भारतीय दर्शन ने सदियों से दुनिया को जीवन, नैतिकता और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाया है। आधुनिक समय में, भारत ने इसे सॉफ्ट पावर के रूप में वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया है। इसके अलावा भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शिक्षा और शांति मिशन ने विश्व समुदाय में सहयोग और संवाद को बढ़ावा दिया है। स्वामी विवेकानंद की शिक्षा और दृष्टि आज भी प्रासंगिक है, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का वैश्विक नेतृत्व केवल शक्ति या प्रभुत्व पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि नैतिकता, सहिष्णुता और आध्यात्मिक नेतृत्व के माध्यम से दुनिया के लिए प्रेरणा बनना चाहिए। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत आज न केवल एक राष्ट्र के रूप में, बल्कि वैश्विक नैतिक महाशक्ति और सॉफ्ट पावर के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है। आज की वैश्विक राजनीति में केवल शक्ति संतुलन और सामरिक दबाव पर्याप्त नहीं हैं, दुनिया को नैतिक और सांस्कृतिक नेतृत्व की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों के अनुसार भारत का वैश्विक योगदान संघर्षों को संवाद, करुणा और नैतिकता के माध्यम से हल करना होना चाहिए। बहुपक्षीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र, ASEAN, BRICS, WHO और WTO में भारत न केवल सक्रिय सदस्य के रूप में, बल्कि नैतिक और प्रेरक नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम है। वैश्विक संकट-चाहे वह शांति और सुरक्षा का हो, शिक्षा और स्वास्थ्य का या पर्यावरणीय, इनमे भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विवेकानंद का दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि भारत का वैश्विक नेतृत्व बल और प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि नैतिकता और ज्ञान पर आधारित है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

Tags: राष्ट्रीय युवा दिवस
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