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Home लेख

नेतृत्व, पराक्रम और त्याग की प्रतिमुर्ति रानी दुर्गावती

राष्ट्रीय छात्रशक्ति by माखन शर्मा
June 24, 2026
in लेख
नेतृत्व, पराक्रम और त्याग की प्रतिमुर्ति रानी दुर्गावती

जब-जब भारत की वीरता,आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति का इतिहास लिखा जाएगा, तब-तब कुछ ऐसे नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित दिखाई देंगे जिन्होंने अपने जीवन को केवल जिया नहीं, बल्कि उसे राष्ट्र की वेदी पर समर्पित कर दिया। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ नई ऊँचाइयों को स्पर्श कर रहा है, अपनी सांस्कृतिक चेतना को पुनः जागृत कर रहा है और विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा है, तब उन महान विभूतियों का स्मरण और भी आवश्यक हो जाता है जिनके त्याग, बलिदान और अदम्य साहस ने इस राष्ट्र की आत्मा को अमर बनाए रखा।

भारतीय संस्कृति में नारी केवल श्रद्धा, करुणा और ममता की प्रतिमूर्ति ही नहीं रही, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वह रणचंडी बनकर अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध भी खड़ी हुई है। हमारे इतिहास की अनेक वीरांगनाओं ने यह सिद्ध किया है कि राष्ट्ररक्षा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए स्त्री किसी भी पुरुष से कम नहीं है। ऐसी ही अद्वितीय वीरांगना थीं महारानी दुर्गावती, जिनका जीवन साहस, त्याग, नेतृत्व और आत्मगौरव की अमर गाथा है।

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर में हुआ था, जो उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बांदा ज़िले में स्थित, मध्यकालीन भारत के सबसे अभेद्य किलों में से एक था। चूँकि उनका जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था, इसलिए उनके माता-पिता ने उनका नाम दुर्गावती रखा। उनका नाम प्रचंड रूप वाली शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा के नाम पर रखा गया गया था।

18 साल की उम्र में, उनका विवाह गढ़ा-मंडला के गोंड राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ, यह विवाह सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण है और आलोचकों पर करारा तमाचा है जो भारतीय संस्कृति में जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का दुष्प्रचार करते हैं। इस विवाह से दो शाही परिवारों के बीच गठबंधन भी मजबूत हुआ।

राजा संग्राम शाह के शासनकाल के दौरान विकसित हुआ यह राज्य, वर्तमान मध्य प्रदेश के मंडला, जबलपुर, नरसिंहपुर, नर्मदपुरम, भोपाल, सागर और दमोह जिलों तथा छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसमें रणनीतिक तौर पर घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बनाए गए कुल 57 किले थे। इस राज्य को आगे जाकर गोंडवाना साम्राज्य के नाम से भी जाना गया है एवं इन सीमाओं को रानी दुर्गावती ने और बढ़ा लिया था।

राजा दलपत शाह की मृत्यु वर्ष 1548 में हुई जिसके बाद उनके नाबालिग पुत्र वीर नारायण उनके उत्तराधिकारी बने और रानी दुर्गावती ने बागडोर संभाली, रानी दुर्गावती ने अपने प्रजावत्सल शासनकाल में अनेक तालाबों, जलाशयों और जल संरचनाओं का निर्माण कराया, जिनमें रानीताल, चेरीताल और अधारताल आज भी उनकी दूरदर्शिता और लोककल्याणकारी दृष्टि के साक्षी हैं।

रानी दुर्गावती के गोंडवाना साम्राज्य की संपन्नता और समृद्धि की चर्चा मुगल दरबार में भी की गई । अकबर ने विधवा रानी दुर्गावती को कमजोर समझते हुए गोंडवाना साम्राज्य हथियाने के उद्देश्य से रानी को आत्मसमर्पण के लिए धमकाया और अपने दूत से संदेश भिजवाया। परंतु गोंडवाना की स्वाभिमानी, स्वतंत्र प्रिय और स्व की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी दुर्गावती नहीं मानी ,रानी ने अपने संदेश के साथ एक सोने का पिंजरा भेजकर अकबर को ललकारा जिससे अकबर तिलमिला गया और उसने आसफ खान को गोंडवाना साम्राज्य की लूट और उसके विनाश के लिए रवाना किया, किंतु वह यह भूल गया कि वह किसी साधारण शासक से नहीं, बल्कि स्वाभिमान की मूर्ति रानी दुर्गावती से टकराने जा रहा है।

अदम्य पराक्रम की प्रतिमुर्ति रानी दुर्गावती

वीरांगना रानी दुर्गावती ने मुगलों से कुल 6 भीषण युद्ध लड़े। मुगल काल मे मध्य क्षेत्र मे अनेक युद्ध हुए लेकिन जो युद्ध रानी दुर्गवाती ने लड़े वे आज भी ख्यात हैं, इतिहासकार कलिकिंकर दत्ता की पुस्तक ‘रानी दुर्गवाती एण्ड हर टाइम्स’ एवं लेखिका नंदिनी सेनगुप्ता की प्रसिद्ध पुस्तक ‘दा फॉर्गाटन लाइफ ऑफ अ वॉरियर क्वीन’ मे इन युद्धों का वर्णन है। जब आसफ खान पहली बार युद्ध के लिए अग्रसर हुआ तब रानी दुर्गावती सतर्क हो गईं और सिंगौरगढ़ में मोर्चा बंदी कर ली। आसफ खान 6 हजार घुड़सवार सेना, 12 हजार पैदल सेना, तोपखाने तथा स्थानीय मुगल सरदारों के साथ सिंगौरगढ़ आ धमका। इतिहासकार बताते हैं की जब आसफ खान ने आत्मसमर्पण के लिए कहा,वीरांगना दुर्गावती ने कहा कि किसी शासक के नौकर से इस संदर्भ में बात नहीं की जा सकती है। वीरांगना रानी दुर्गावती ने भयंकर आक्रमण किया, मुगलों के पैर उखड़ गये और आसफ खान भाग निकला। इसी प्रकार सिंगौरगढ़ में तीन युद्ध ,चंडाल भाटा का युद्ध, गौर नदी का युद्ध एवं नर्रई के घमासान युद्ध समेत 6 युद्धों मे रानी दुर्गावती ने अपना अदम्य पराक्रम दिखाया।

नर्रई का रणक्षेत्र एवं स्व के लिए बलिदान

रानी दुर्गावती ने नर्रई की ओर कूच किया और निर्णायक युद्ध के लिए अपनी सेना को संगठित किया। 23 जून 1564 को नर्रई की धरती पर पहली भीषण मुठभेड़ हुई। रानी दुर्गावती के नेतृत्व में गोंड सेना ने ऐसा प्रचंड प्रतिकार किया कि मुगल सेना के पांव उखड़ गए और आसफ खान को पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ा। पराजित मुगल सेना बरेला की दिशा में पीछे हट गई, किंतु उसी रात परिस्थितियों ने एक नया मोड़ ले लिया। कहा जाता है कि रात्रि के अंधकार में विश्वासघात का एक घातक षड्यंत्र रचा गया और रानी की युद्धनीति की जानकारी शत्रु तक पहुँच गई।

24 जून 1564 की प्रभात बेला में रणभूमि पुनः सज चुकी थी। वीरांगना रानी दुर्गावती ने भारतीय युद्धकला की प्रसिद्ध “क्रौंच व्यूह” रचना की। सारस पक्षी के आकार में सुसज्जित सेना के अग्रभाग में स्वयं रानी दुर्गावती थीं, दाहिने पंख पर युवराज वीर नारायण और बाएँ पंख पर उनके विश्वस्त सेनापति अधार सिंह मोर्चा संभाले खड़े थे। युद्ध प्रारंभ होते ही रणभूमि तलवारों की टंकार, रणघोष और वीरों की हुंकार से गूँज उठी। मुगल सेना ने बार-बार आक्रमण किए, किंतु प्रत्येक बार गोंड वीरों ने उन्हें पीछे धकेल दिया। जब प्रत्यक्ष युद्ध में सफलता नहीं मिली, तब मुगलों ने तोपखाने का सहारा लिया। परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती जा रही थीं, फिर भी रानी दुर्गावती का साहस तनिक भी विचलित नहीं हुआ। युद्ध के दौरान उनकी आँख में तीर आ लगा, किंतु उन्होंने पीड़ा की परवाह किए बिना युद्ध जारी रखा।

रक्तरंजित रणभूमि में घायल अवस्था में भी वे अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाती रहीं। जब उनके सहयोगियों ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास किया, तब रानी समझ चुकी थीं कि उनका अंतिम समय निकट है। उन्होंने बंदी बनकर अपमानित जीवन जीने की अपेक्षा स्वाभिमानपूर्ण मृत्यु को श्रेष्ठ माना। कहा जाता है कि उन्होंने अपने विश्वस्त अधार सिंह से कहा-“मृत्यु तो प्रत्येक प्राणी को आती है, किंतु इतिहास उन्हीं को स्मरण रखता है जो स्वाभिमान के साथ जीते हैं और स्वाभिमान के साथ ही प्राण त्यागते हैं।”  उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक युद्ध किया और जब चेतना क्षीण होने लगी, तब अपनी कटार से स्वयं प्राणोत्सर्ग कर भारतीय इतिहास में अमर हो गईं। 24 जून 1564 को नर्रई की धरती पर एक रानी का जीवन समाप्त हुआ, किंतु उसी क्षण एक अमर गाथा का जन्म हुआ।

रानी दुर्गावती केवल गोंडवाना की महारानी नहीं थीं; वे स्वाभिमान, स्वतंत्रता और राष्ट्रधर्म की साक्षात् प्रतिमूर्ति थीं। उनका बलिदान आज भी हमें यह संदेश देता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत क्यों न हों, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का मूल्य किसी भी जीवन से बड़ा होता है। ऐसी महान वीरांगना को राष्ट्र सदैव श्रद्धा और गौरव के साथ स्मरण करता रहेगा।

रानी दुर्गावती केवल गोंडवाना की महारानी नहीं थीं, बल्कि वह स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रनिष्ठा की जीवंत प्रतीक थीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व, पराक्रम और त्याग किसी एक वर्ग या लिंग की बपौती नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति का परिणाम हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने सम्मान और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया तथा अंतिम क्षण तक मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्षरत रहीं।

आज, जब भारत आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक गौरव और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तब रानी दुर्गावती का जीवन हमें कर्तव्य, साहस और आत्मसम्मान का अमूल्य संदेश देता है। उनका बलिदान केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का एक शाश्वत स्रोत है और विशेषकर युवाओं के लिए उनका व्यक्तित्व नेतृत्व और साहस का शाश्वत आदर्श है । राष्ट्र उनकी वीरता, त्याग और अदम्य संकल्प को सदैव श्रद्धापूर्वक नमन करता रहेगा।

 (लेखक अभाविप केन्द्रीय कार्यसमिति सदस्य हैं।)

 

 

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