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Home लेख

भारतीयता का उद्घोषक विद्यार्थी परिषद

राष्ट्रीय छात्रशक्ति by अमन दुबे
July 9, 2026
in लेख
व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला विद्यार्थी परिषद

भारत में विद्यार्थियों को केवल शिक्षा प्राप्त करने वाला नहीं, बल्कि आत्मनिर्माण, चरित्र निर्माण और राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने शिक्षा को जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार बताया है। इसी कारण भारतीय परंपरा में विद्यार्थी को ज्ञान का साधक, समाज का उत्तरदायी सदस्य और राष्ट्र के भविष्य का निर्माता माना गया है। जब-जब भारत के समक्ष राष्ट्रीय चुनौतियाँ आई हैं, तब-तब युवाशक्ति ने अपने साहस, त्याग और नेतृत्व से इतिहास की दिशा बदलने का कार्य किया है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर लोकतंत्र की रक्षा और सामाजिक पुनर्जागरण तक छात्रशक्ति ने सदैव अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी राष्ट्रीय परंपरा का स्मरण कराता है 9 जुलाई, जिसे राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के समक्ष केवल राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण का प्रश्न नहीं था, बल्कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण की व्यापक चुनौती भी थी। विभाजन की पीड़ा, औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की मानसिकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के पुनर्स्थापन की आवश्यकता ने यह स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्र निर्माण में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। इसी उद्देश्य से 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) की स्थापना हुई। आज अभाविप को विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन माना जाती है। राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस केवल एक संगठन का स्थापना दिवस नहीं, बल्कि छात्रशक्ति की राष्ट्रीय भूमिका के स्मरण का अवसर है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रारंभ से ही यह स्पष्ट किया कि छात्र केवल भविष्य का नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान का सक्रिय नागरिक है। अभाविप के शिल्पकार प्रा. यशवंतराव केलकर ने इस विचार को संगठन के कार्यदर्शन का आधार बनाया। यह दृष्टि छात्र जीवन को केवल परीक्षा, डिग्री और रोजगार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व से जोड़ती है। इसी कारण परिषद ने छात्र राजनीति को सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का साधन माना।
ज्ञान, शील और एकता परिषद का ध्येय वाक्य है। ज्ञान का अर्थ केवल सूचना या उपाधि प्राप्त करना नहीं, बल्कि विवेक, चिंतन और सत्य की खोज है। शील व्यक्ति के चरित्र, अनुशासन और नैतिक आचरण का प्रतीक है, जबकि एकता विविधताओं के सम्मान के साथ राष्ट्रीय समरसता का आधार है। परिषद का विश्वास है कि केवल प्रतिभाशाली नागरिक पर्याप्त नहीं हैं; राष्ट्र को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ भी हों।
शिक्षा के क्षेत्र में परिषद ने सदैव गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित शिक्षा की वकालत की है। छात्रावासों की व्यवस्था, छात्रवृत्तियों का विस्तार, अनुसंधान को प्रोत्साहन, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, छात्राओं की सुरक्षा, कौशल विकास और समान शैक्षणिक अवसर जैसे विषय उसके प्रमुख सरोकार रहे हैं। देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में परिषद ने छात्र समस्याओं को केवल स्थानीय मुद्दा न मानकर राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने का प्रयास किया है।
राष्ट्र जीवन के अनेक महत्वपूर्ण आंदोलनों में परिषद की सक्रिय भूमिका रही है। गुजरात नव निर्माण आंदोलन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन में परिषद के कार्यकर्ताओं ने भ्रष्टाचार और कुशासन के विरुद्ध व्यापक जनजागरण किया। वर्ष 1975 के आपातकाल के दौरान जब लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया गया, तब परिषद के हजारों कार्यकर्ताओं ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया। अनेक कार्यकर्ता जेल गए और अनेक ने भूमिगत रहकर जनजागरण का कार्य किया। इस संघर्ष ने सिद्ध किया कि छात्रशक्ति केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध रहती है।
राष्ट्रीय एकात्मता परिषद के कार्य का एक महत्वपूर्ण आयाम रहा है। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में परिषद ने सदैव राष्ट्रीय अखंडता का समर्थन किया और कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन जैसे विषयों को राष्ट्रीय विमर्श में प्रमुखता से उठाया। इसके साथ ही SEIL (Students’ Experience in Inter-State Living) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत और देश के अन्य भागों के विद्यार्थियों के बीच सांस्कृतिक संवाद और आत्मीयता को बढ़ाने का कार्य किया गया। ऐसे प्रयास केवल परिचय का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को सुदृढ़ करने की प्रभावी पहल हैं।
परिषद का कार्य केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं, महामारी और अन्य सामाजिक संकटों के समय परिषद के कार्यकर्ताओं ने सेवा कार्यों के माध्यम से समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता और जनजागरण जैसे अनेक क्षेत्रों में परिषद की रचनात्मक गतिविधियाँ यह प्रमाणित करती हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि सेवा और संगठन से भी होता है।
आज भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में अग्रणी है। विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य तभी साकार होगा, जब हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल कुशल पेशेवर नहीं, बल्कि उत्तरदायी नागरिक तैयार करेगी। आज का विद्यार्थी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहा है। ऐसे समय में उसके लिए ज्ञान के साथ चरित्र, आधुनिकता के साथ सांस्कृतिक आत्मबोध और व्यक्तिगत सफलता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन बनाए रखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।
राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस हमें स्मरण कराता है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिक के रूप में विकसित करना है। जब विश्वविद्यालय विचार, चरित्र और नेतृत्व के केंद्र बनेंगे तथा विद्यार्थी ज्ञान को सेवा, सेवा को संस्कार और संस्कार को राष्ट्रभाव से जोड़ेंगे, तभी भारत अपने विकसित राष्ट्र के लक्ष्य को स्थायी आधार प्रदान कर सकेगा।
इसी संदर्भ में “छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति” केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रचिंतन का जीवंत सिद्धांत है। यह हमें विश्वास दिलाता है कि राष्ट्र का भविष्य संसदों या सरकारों में ही नहीं, बल्कि देश के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बैठी उस छात्रशक्ति के हाथों में भी सुरक्षित है, जो ज्ञान, चरित्र और राष्ट्रनिष्ठा के साथ भारत के भविष्य का निर्माण करने का संकल्प रखती है।

(लेखक अभाविप अवध प्रांत के राज्य विश्वविद्यालय कार्य संयोजक हैं।)

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