जब हम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान केवल राजनीतिक संघर्ष और सत्ता के हस्तांतरण पर केंद्रित हो जाता है। किंतु इस महासमर के पार्श्व में एक सांस्कृतिक और भाषाई पुनर्जागरण की धारा भी सतत प्रवाहित हो रही थी, जिसके भगीरथ पंडित मदन मोहन मालवीय थे। महामना के लिए स्वराज केवल एक राजनीतिक व्यवस्था का परिवर्तन नहीं था, बल्कि वह राष्ट्र के ‘स्व’ की खोज थी। उनकी दृष्टि में भाषा केवल संवाद का औपचारिक माध्यम नहीं, अपितु राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति और उसकी सामूहिक चेतना की संवाहिका थी। मालवीय जी का स्पष्ट मत था कि विदेशी भाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा युवाओं को अपनी जड़ों से काटकर एक ऐसी बौद्धिक दासता की ओर ले जाती है, जहां से मौलिक चिंतन की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं।
उनका यह विश्वास 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय और अधिक मुखर होकर सामने आया। उस दौर में, जब अंग्रेजी का आधिपत्य विद्वत्ता का पैमाना माना जाता था, महामना ने विश्वविद्यालय के प्रांगण में हिंदी और संस्कृत को वह गरिमा प्रदान की, जिसकी वे वास्तविक अधिकारी थीं। उन्होंने पूरे विश्व को यह दिखाया कि आधुनिक विज्ञान, दर्शन और तकनीक की शिक्षा अपनी मातृभाषा में न केवल संभव है, बल्कि अधिक प्रभावी भी है। बीएचयू की स्थापना केवल एक शैक्षणिक संस्थान का निर्माण नहीं, बल्कि भाषाई आत्मनिर्भरता का प्रारंभिक और सबसे सशक्त कदम था।
महामना के भाषाई संघर्ष का एक स्वर्णिम अध्याय उन्नीसवीं सदी के अंत में मिलता है। उस समय उत्तर प्रदेश की अदालतों और सरकारी दफ्तरों में ऐसी भाषा का वर्चस्व था, जिसे साधारण जनता समझने में सर्वथा असमर्थ थी। आम आदमी के लिए न्याय पाना एक भाषाई भूलभुलैया से गुजरने जैसा था। मालवीय जी ने इसके विरुद्ध एक लंबी वैचारिक लड़ाई लड़ी। उनके गहन शोध और 1897 के ऐतिहासिक मेमोरेंडम ने ब्रिटिश हुकूमत को झुकने पर मजबूर किया और वर्ष 1900 में अदालतों में देवनागरी लिपि को आधिकारिक प्रवेश मिला। यह केवल एक लिपि की जीत नहीं थी, बल्कि सामान्य जनमानस के अपने तंत्र से जुड़ने की पहली बड़ी संवैधानिक विजय थी।
संस्कृत के प्रति उनका अनुराग किसी संकीर्णता का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरी वैज्ञानिक दृष्टि का परिचायक था। वे संस्कृत को भारतीय ज्ञान की जननी मानते थे और चाहते थे कि वेद, उपनिषद और व्याकरण का यह प्राचीन भंडार केवल मठों तक सीमित न रहकर आधुनिक अनुसंधान का हिस्सा बने। आज जिस ‘सत्यमेव जयते’ को हम अपने राष्ट्र के आदर्श वाक्य के रूप में गर्व से दोहराते हैं, उसे मुण्डकोपनिषद से निकालकर सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित करने का श्रेय महामना को ही जाता है। 1918 के कांग्रेस अधिवेशन में उनके द्वारा लोकप्रिय बनाया गया यह मंत्र आज हमारी राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न अंग है।
मालवीय जी का भाषाई दृष्टिकोण अत्यंत समावेशी और व्यापक था। वे हिंदी के प्रखर पैरोकार होते हुए भी बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगु और गुजराती जैसी समस्त भारतीय भाषाओं को एक ही माला के सूत्र मानते थे। उनका मानना था कि भारतीय भाषाओं की विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक शक्ति है। कुंभ जैसे विशाल आयोजनों में उन्होंने विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के विद्वानों को एकत्रित कर भाषाई एकता का जो सेतु निर्मित किया, वह आज भी अनुकरणीय है। ‘अभ्युदय’ और ‘हिंदुस्तान’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को राष्ट्रवाद का स्वर प्रदान किया, जो स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण का प्रमुख माध्यम बना।
आज जब हम ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ के माध्यम से पुनः अपनी भाषाओं को शिक्षा के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं, तब मालवीय जी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। महामना ने हमें सिखाया कि आधुनिक बनने के लिए अपनी विरासत को तिलांजलि देना आवश्यक नहीं है। उनके जीवन की गौरवशाली यात्रा पर दृष्टि डालें तो 1861 में प्रयागराज में उनके जन्म से लेकर, 1910 में हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता और 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना तक, उनका हर कदम भाषाई स्वाभिमान को समर्पित रहा।
मालवीय जी का जीवन हमें संदेश देता है कि भाषा का प्रश्न केवल व्याकरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के आत्म-गौरव का प्रश्न है। आज के युवा वर्ग को यह समझने की आवश्यकता है कि वैश्विक नागरिक बनने की होड़ में हमें अपनी मातृभाषाओं की मिठास और उनकी शक्ति को विस्मृत नहीं करना चाहिए। महामना के सपनों का भारत तभी निर्मित होगा जब हम अपनी भाषाओं को हीनभावना के कुहासे से बाहर निकालकर उन्हें आधुनिक विकास का आधार बनाएंगे। उनकी जयंती पर यह संकल्प लेना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम भारतीय भाषाओं की विविधता को संरक्षित रखते हुए राष्ट्र के सांस्कृतिक गौरव को अक्षुण्ण रखेंगे।
( लेखक, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
