नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 11 छात्राओं से जुड़े कथित यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने बुधवार को स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान अभाविप ने जेएनयू के प्रोफेसर एवं मणिपुर से कांग्रेस के लोकसभा सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजम को पद से बर्खास्त करने तथा शिकायत करने वाली छात्राओं को न्याय दिलाने की मांग की।
अभाविप का आरोप है कि लगभग चार महीने पहले जेएनयू की 11 छात्राओं ने प्रो. बिमोल अकोइजम के विरुद्ध आंतरिक शिकायत समिति (IC) में यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन अब तक मामले का प्रभावी निस्तारण नहीं किया गया। अभाविप ने जेएनयू की आंतरिक शिकायत समिति और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों की मौजूदगी और प्रशासन की भूमिका के कारण मामले को चार महीने तक दबाकर रखा गया। अभाविप ने कहा कि विशाखा दिशानिर्देशों के तहत यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निस्तारण के लिए निर्धारित समयसीमा 90 दिनों की रही है, ऐसे में चार महीने तक मामले का लंबित रहना गंभीर प्रश्न खड़े करता है। परिषद ने मांग की कि शिकायतों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए और छात्राओं को बिना किसी दबाव के न्याय सुनिश्चित किया जाए।
कांग्रेस और वामपंथी संगठनों की चुप्पी पर अभाविप ने उठाए सवाल
अभाविप ने कांग्रेस पार्टी, उसके छात्र संगठन एनएसयूआई तथा वामपंथी छात्र संगठनों पर भी निशाना साधा। परिषद का आरोप है कि छात्राओं के अधिकारों और महिला सुरक्षा की बात करने वाले संगठन इस मामले में पिछले चार महीनों से चुप्पी साधे हुए हैं। अभाविप ने जेएनयू की आंतरिक शिकायत समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि समिति पर राजनीतिक प्रभाव हावी हो गया है और कार्रवाई में चयनात्मकता बरती जा रही है।
अभाविप ने अपने बयान में वामपंथी एवं कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठनों से जुड़े रहे अनमोल रतन, फिरोज खान और प्रसन्ना राज के मामलों का भी उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि अतीत में भी ऐसे मामलों में राजनीतिक संरक्षण और चयनात्मक कार्रवाई के सवाल उठते रहे हैं। अभाविप का कहना है कि अब कांग्रेस सांसद एवं जेएनयू प्रोफेसर बिमोल अकोइजम से जुड़ा यह मामला भी उसी संदर्भ में गंभीर सवाल खड़े करता है।
“छात्राओं को न्याय मिलने तक विद्यार्थी परिषद संघर्ष करेगी”
अभाविप जेएनयू की छात्रा कार्य प्रमुख मनीषा डाबला ने कहा, “जेएनयू में वाम संगठनों और कांग्रेस से जुड़े लोगों द्वारा छात्राओं के शोषण का आरोप कोई नई बात नहीं है। उनका इतिहास छात्राओं की सुरक्षा और न्याय के सवाल पर दोहरे मापदंड अपनाने का रहा है। उनके प्रतिनिधि जो आंतरिक शिकायत समिति में बैठे हैं, वे पहले GSCASH (Gender Sensitization Committee Against Sexual Harassment) के समय भी अपने लोगों को बचाते रहे हैं और आज भी वही भूमिका निभा रहे हैं।”
उन्होंने कहा, “इस पूरे मामले में लेफ्ट के छात्र संगठन, कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई चुप्पी साधे हुए हैं। विद्यार्थी परिषद उन छात्राओं को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है और हम शिकायत करने वाली छात्राओं के साथ खड़े हैं।”
“सवाल केवल आरोपों का नहीं, न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने वालों का भी है”
अभाविप जेएनयू के अध्यक्ष मयंक पांचाल ने कहा कि वामपंथी राजनीति का इतिहास छात्र हितों और महिला सुरक्षा के नाम पर बड़े-बड़े दावे करने का रहा है, लेकिन जब गंभीर सवाल उनके राजनीतिक दायरे में खड़े होते हैं तो वही लोग चुप्पी साध लेते हैं। जेएनयू के विद्यार्थी अब इस दोहरे चरित्र को देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज सवाल केवल एक प्रोफेसर पर लगे आरोपों का नहीं है, बल्कि यह भी है कि शिकायत करने वाली 11 छात्राओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में कौन-कौन से तत्व बाधा बन रहे हैं। चार महीने से लंबित इस मामले ने जेएनयू की आंतरिक शिकायत व्यवस्था की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। मयंक पांचाल ने कहा कि अभाविप प्रोफेसर बिमोल अकोइजम को बर्खास्त करने की मांग करती है और जेएनयू प्रशासन से मांग करती है कि मामले की शिकायतों पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निष्पक्ष एवं समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए तथा शिकायतकर्ता छात्राओं को न्याय मिले।
