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Home लेख

वेदना, चीख, रक्त और बलिदान से सना जलियांवाला बाग की लौ बुझने न पाए

राष्ट्रीय छात्रशक्ति by
December 9, 2019
in लेख, विविधा
वेदना, चीख, रक्त और बलिदान से सना जलियांवाला बाग की लौ बुझने न पाए

आश्विन शर्मा
जलियांवाला बाग…वीभत्स, निर्मम ,ह्रदयविदारक हत्याकांड ! अंग्रेजी हुकूमत के दिए सदैव चुभने वाले दंशो में से एक । इस बाग की दीवारें मानो गोलियों से छलनी अपना वक्ष खोलकर दिखाती है और कहती है देखो हमारे भी घाव , हमपर चली हुई गोलियां फिर स्मरण आता है इन दीवारों का भी स्वाधीनता में योगदान । जलियांवाला बाग पर
यूं तो लिखने और कहने को बहुत कुछ है वेदना , दुख, पीड़ा, किस्से , कथा और भी बहुत कुछ..
पर जब भी यह खौफनाक किस्सा सुनाई भी पड़ता है तो जेहन में उस वीभत्स मंजर की कल्पना चित्रित हो जाती है अभी आगरा में आयोजित विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में जलियांवाला बाग हत्याकांड की शताब्दी वर्ष पर प्रदर्शनी बनाई गई । गोलियों से छलनी दीवारें ओर लाशों से अटा कुआं भी प्रदर्शनी को जीवंत रूप देने की पुरी कोशिश कर रहा था ओर सबसे अहम बात उस प्रदर्शनी स्थल पर रखे वहां की पवित्र मिट्टी के कलश ।
पवित्र मिट्टी के कलश देशभर के कैम्पसों में भेजने की योजना इस शताब्दी वर्ष में विद्यार्थी परिषद ने की है जो इतिहास कार्य पाठ्यक्रम के माध्यम से इस देश की भावी पीढ़ी को विरासत रूप मिलना था इन कलशों में सिमटी हुई बलिदान गाथा से शायद यह कुछ हद तक हो सकेगा । आजादी आंदोलन के लिखे गए इतिहास में सेनानियों को न्याय नही दिया गया कुछ परिवारों ओर व्यक्तियों के महिमामंडन में पोथिया भर दी गयी तो कुछ के नाम के अक्षर आज भी इंतजार में है । ब्रिटिश हुकूमत के सामने जान हथेली पर लेकर खड़े होने वाले अनेक क्रांतिकारी ओर उनकी कहानियां है जिन्होंने हुकूमत के दांत खट्टे किये है। जलियांवाला बाग हत्याकांड की पृष्ठभूमि का सम्बंध प्रथम विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजी हुकूमत के शुरू हुए विरोध से है ।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पंजाब के क्षेत्र में ब्रिटिशों का विरोध कुछ अधिक बढ़ा जिसे भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) लागू कर के कुचल दिया गया था। उसके बाद 1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक सेडीशन समिति नियुक्त की गई थी जिनको यह पता लगाने की ज़िम्मेदारी दी गयी कि भारत में, विशेषकर पंजाब और बंगाल में ब्रिटिशों का विरोध किन शक्तियों की सहायता से हो रहा था। इस समिति के सुझावों के अनुसार भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) का विस्तार कर के भारत में रॉलट एक्ट लागू किया गया था, जो आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को और अधिक अधिकार दिए गए थे जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमें के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी, उन पर विशेष ट्रिब्यूनलों और बंद कमरों में बिना जवाबदेही मुकदमा चला सकती थी इसके विरोध में पूरा भारत उठ खड़ा हुआ और देश भर में लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे। देश के अधिकांश शहरों में 30 मार्च और 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया. हालांकि इस हड़ताल का सबसे ज़्यादा असर पंजाब के ही अमृतसर, लाहौर, गुजरांवाला और जालंधर शहर में देखने को मिला. लाहौर और अमृतसर में हुई जन-सभाओं में तो पच्चीस से तीस हज़ार तक लोग शामिल हुए.9 अप्रैल को राम नवमी के दिन लोगों ने एक मार्च निकाला. राम नवमी के मौक़े पर निकले इस मार्च में हिंदू तो थे ही मुस्लिम भी शामिल हुए. मुस्लिमों ने तुर्की सैनिकों जैसे लिबास पहन रखे थे. बड़ी संख्या में लोग तो जमा हुए ही थे लेकिन जनरल डायर और उनके प्रशासन को सबसे अधिक चिंता हिंदू-मुस्लिम एकता देखकर हुई.।
13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग़ में उस दिन रोलेट एक्ट के विरोध में इसी उद्देश्य की एक सभा जारी थी फिर क्या हुआ, आज हर किसी को मुंहज़बानी पता है. 13 अप्रैल को लगभग शाम के साढ़े चार बज रहे थे, जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में मौजूद क़रीब 25 से 30 हज़ार लोगों पर गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया. वो भी बिना किसी पूर्व चेतावनी के. ये गोलीबारी क़रीब दस मिनट तक बिना सेकंड रुके होती रही. जनरल डायर के आदेश के बाद सैनिकों ने क़रीब 1650 राउंड गोलियां चलाईं. गोलियां चलाते-चलाते चलाने वाले थक चुके थे हजारों लोग शहीद हुए और घायल भी ! रक्त की नदी और लाशों से अटा हुआ बाग इस मंजर को देखकर आखों में आंसुओ के स्थान पर खून उतर जाता है ऐसे ही आक्रोश ने अनेको क्रांतिकारियों को जन्म दिया तो दूसरी ओर भगत ओर उधम को फाँसी को रस्सी चूमने का साहस भी दिया।
पराधीनता की बेड़िया तोड़ने में अपना बलिदान देने वाले असंख्य सेनानियो के रक्त से पवित्र मिट्टी के कलश प्रदेशो के प्रतिनिधियों को सौपते समय अभाविप के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री माननीय श्रीनिवास जी का उदबोधन ने मन व मानस पर इस घटना के चित्र उकेर दिए । “शहीदों का बलिदान याद रखेगा हिंदुस्तान” जैसे नारे भी लगे । आज के छात्र को अपने बलिदानियों की परंपरा से जोड़ना चाइए इस बहुप्रतीक्षित उद्देश्य को यह पवित्र माटी की केम्पस तक कि यात्रा निश्चित ही पूरा करेगी। इस मिट्टी का कण-कण पवित्र तो है ही साथ ही अग्नि के समान ओजवान भी है । यह माटी उन सभी बलिदानियों की गाथा गाती है जिन्होंने स्वाधीन भारत का स्वप्न देखा , यह नन्हे भगत को क्रांतिकारी भगतसिंह बनने का आक्रोश देती है , यही वह माटी है जो यौवन में चढ़ते उधमसिंह के सीने में आग की तरह जलती है और बदला लेने पर मजबूर करती है साथ ही हंसकर फंदे पर झूलने का साहस भी देती है । यह माटी ही है जिसे हाथ मे लेकर असंख्य युवाओ ने इंकलाब बोलकर माँ के आंचल,प्रेमिका के प्रेम ओर यौवन के आकर्षणों से मुंह मोड़ लिया । इसी पवित्र माटी को मस्तक पर चंदन की भांति सजाकर स्वाधीनता के यज्ञ में आहुतियां लगी है ।

मैं मानता हूं हुकूमत की गोलियों के शोर से ज्यादा बलिदानियों की बोली से इंकलाब गूंजा होगा । जलियांवाला बाग की इस पवित्र माटी का कण-कण बलिदानियों के खून से भीगा है इस माटी में संकल्प है भारत का, यह स्वाधीनता के स्वप्न है उन बलिदानियों ने देखा था । एक पंक्ति स्मरण आती है –
धूल के कण रक्त से धोएं गए है
विश्व के संताप सब धोए गए है
पांव के बल मत चलो अपमान होगा
सिर शहिदो के यहां बोए गए है

इस मिट्टी का कण-कण पवित्र है यह मिट्टी निश्चित ही आज के युवा भगत के मन से भगतसिंह को निकाल कर लाएगी और 21 वी सदी के भारत को बढ़ाने में हम अपनी आवाज बुलंद करेगे
(लेखक अभाविप गुजरात प्रान्त के संगठन मंत्री हैं)

Tags: #64ABVPConfabvpअखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्एबीवीपीजलियांवाला बाग नरसंहारजलियांवाला बाग शताब्दी वर्षदेशभक्तिविद्यार्थी परिषद्
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