9/11—एक ऐसी तिथि, जिसे सुनते ही हमारे मन में दो ऊंची इमारतें, उनसे टकराते विमान, ओसामा बिन लादेन, जॉर्ज बुश और आतंकवाद से जुड़ी अनेक घटनाएं एक साथ उभर आती हैं। इस तारीख के साथ भय और विध्वंस की एक पूरी स्मृति जुड़ी हुई है लेकिन क्या 9/11 का हमारा यह Point of Reference अधूरा नहीं है?
हम 9/11 कहते ही न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के विध्वंस को याद करते हैं, लेकिन उसी 9/11 की वह स्मृति हमारी चेतना से ओझल हो जाती है, जब शिकागो की धरती से भारत की सनातन संस्कृति की आवाज पहली बार आधुनिक पश्चिमी जगत के विराट मंच पर गूंजी थी।
9/11 केवल 11 सितंबर 2001 नहीं है। 9/11, 11 सितंबर 1893 भी है। वह ऐतिहासिक दिन, जब भारत के एक युवा संन्यासी ने विश्व धर्म संसद के मंच से सनातन संस्कृति के उस स्वर को मुखर किया, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी विश्व में सुनाई देती है। वह संन्यासी थे—स्वामी विवेकानंद। और मेरे लिए 9/11 का अर्थ है—नरेंद्र। वही नरेंद्रनाथ दत्त, जिन्हें संसार ने आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से जाना।
11 सितंबर का वह दिन जब भारत ने विश्व से संवाद किया
आज से 133 वर्ष पहले 11 सितंबर 1893 को लेक मिशिगन के तट पर बसे अमेरिका के घनी आबादी वाले शहर शिकागो ने विश्व धर्म संसद में भारत की आत्मा से साक्षात्कार किया। विश्व धर्म संसद में दुनिया के विभिन्न धर्मों और परंपराओं के प्रतिनिधि वहां एकत्र हुए थे। भारत की ओर से एक युवा तपस्वी भी वहां उपस्थित था। आयु मात्र 30 वर्ष, वेश भगवा, व्यक्तित्व सरल और साधारण, लेकिन मस्तक पर ज्ञान का तेज और अंतर्मन में भारत की सनातन चेतना।
पश्चिमी समाज की दृष्टि में भारत उस समय पिछड़ेपन, अंधविश्वास और निर्धनता का पर्याय बना दिया गया था। भारत को सपेरों का देश कहकर उपहास करने वाली मानसिकता के सामने एक भारतीय संन्यासी खड़ा था।उनके वस्त्र पश्चिमी विद्वानों के सूट-बूट से मेल नहीं खाते थे। उनका व्यक्तित्व भी किसी राजदूत अथवा अकादमिक विद्वान जैसा नहीं था। किंतु उनके भीतर जो था, वह किसी बाहरी आवरण का मोहताज नहीं था।
ज्ञान था, किंतु अहंकार नहीं।
आत्मविश्वास था, किंतु आक्रामकता नहीं।
परंपरा थी, किंतु संकीर्णता नहीं।
विश्व धर्म संसद में विभिन्न मतों और पंथों के प्रतिनिधि अपने-अपने धर्म और सिद्धांतों की श्रेष्ठता प्रस्तुत कर रहे थे। धर्म अलग थे, लोग अलग थे, परंतु आग्रह अनेक बार एक ही था—
मेरा धर्म श्रेष्ठ है, मेरे सिद्धांत श्रेष्ठ हैं और मेरी परंपरा सर्वोत्तम है।
इसी वातावरण में स्वामी विवेकानंद का नाम पुकारा गया।
वह उठे। मंच की ओर बढ़े। और वह अकेले मंच की ओर नहीं बढ़ रहे थे। उनके साथ भारत की सनातन संस्कृति चल रही थी। उनके साथ भारत की ज्ञान-परंपरा चल रही थी। उनके साथ हजारों वर्षों की सभ्यतागत स्मृति चल रही थी।
30 वर्ष का ज्योतिपुंज था, ज्ञान पुष्प का सुलभ कुंज था।
मस्तक पर अर्हम् की रेखा, चकित रह गया जिसने देखा।
शब्द सुदर्शनधारी था वो, देवदूत अवतारी था वो।
विश्व प्रतीक्षा कर रहा था—अब भारत क्या कहेगा?
वे पांच शब्द, जिसे सुनकर पूरी सभा तालियों से गूंज उठी
स्वामी विवेकानंद मंच पर पहुंचे। कुछ क्षणों तक उन्होंने सभागार को देखा। उत्सुकता बढ़ती गई। लोग प्रतीक्षा करने लगे कि यह युवा संन्यासी क्या कहेगा। और फिर उन्होंने केवल पाँच शब्द कहे—
“Sisters and Brothers of America.”
अर्थात—
“अमेरिका के भाइयों और बहनों।”
इन पांच शब्दों ने सभागार का वातावरण बदल दिया। वहां उपस्थित 7 हजार लोग मंत्रमुग्ध रह गए। लंबे समय तक तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही। स्वामी विवेकानंद ने अभी अपना भाषण आरंभ भी नहीं किया था, लेकिन उनके संबोधन ने श्रोताओं के मन को स्पर्श कर लिया था।
क्यों?
क्योंकि ये केवल संबोधन के पांच शब्द नहीं थे।
इन पांच शब्दों में भारत की एक ऐसी दृष्टि अभिव्यक्त हो रही थी, जो मनुष्य को उसकी जाति, रंग, भाषा, भूगोल अथवा पंथ के आधार पर विभाजित नहीं करती। यह संबोधन केवल भाषण की शुरुआत नहीं था। यह भारत की आत्मा का विश्व के सामने उद्घोष था।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ से विश्वबंधुत्व तक
स्वामी विवेकानंद के उन पांच शब्दों की आत्मा को समझने के लिए भारत की उस दृष्टि को समझना होगा, जो मनुष्य और संसार को एक व्यापक परिवार के रूप में देखती है।
महोपनिषद के चौथे अध्याय के 71वें श्लोक में कहा गया है—
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्॥”
अर्थात—यह अपना है और यह पराया है, ऐसी गणना छोटे हृदय वाले लोग करते हैं। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
यही वह भाव है, जिसकी आधुनिक अभिव्यक्ति शिकागो के उस मंच पर सुनाई दी – Sisters and Brothers.
हजारों मील दूर से आया एक संन्यासी, न भाषा की समानता, न रक्त का संबंध—फिर भी संबोधन में भाई और बहन! यह केवल शिष्टाचार नहीं था। यह एक सभ्यता-दृष्टि थी। हमारे लिए संसार का विभाजन ‘दूसरा’ और ‘तीसरा’ नहीं है। संसार एक है और उसमें सब समाहित हैं—गोरे-काले, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदियां और सागर। हमारी सांस्कृतिक चेतना में प्रकृति भी परिवार का हिस्सा है और मानव मात्र भी।
इसी भाव को एक गीत की पंक्तियां सहज रूप में व्यक्त करती हैं—
काले-गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है।
जीते हो किसी ने देश तो क्या, हमने तो दिलों को जीता है।
जहाँ राम अभी तक है नर में, नारी में अभी तक सीता है।
इतने पावन हैं लोग जहां, मैं नित-नित शीश झुकाता हूं।
इतनी ममता नदियों को भी, जहां माता कहके बुलाते हैं।
इतना आदर इंसान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं।
इस धरती पे मैंने जनम लिया, ये सोच के मैं इतराता हूं।
भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।
यह भाव ही भारत की उस सांस्कृतिक दृष्टि का परिचायक है, जिसमें मानवता का सम्मान किसी बाहरी प्रमाणपत्र का विषय नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का स्वाभाविक अंग है।
अपमान का उत्तर आभार से
उन पांच शब्दों के बाद स्वामी विवेकानंद ने कहा—
“आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है, उससे मेरा दिल भर आया है। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।”
इन शब्दों की महत्ता को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को भी स्मरण करना होगा। विश्व धर्म संसद में बोलने से तकरीबन डेढ़ महीने पहले जब स्वामी जी अमेरिका आए थे, तब उन्हें वहां उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ा था। उन्हें ऐसे शब्द भी सुनने पड़े—
“You Black, Get Out!”
डेढ़ महीने तक अपमान सहने के बाद भी स्वामी विवेकानंद के भीतर कड़वाहट नहीं आई। उन्होंने प्रतिशोध नहीं चुना। उन्होंने आभार चुना। भारत की संस्कृति को यदि एक प्रतीक में समझना हो तो वह नीलकंठ शिव हैं—विष को धारण करके भी अमृतमय जीवन का मार्ग प्रशस्त करना। स्वामी विवेकानंद ने भी अपमान का विष अपने भीतर धारण किया, लेकिन जब बोलने का अवसर आया तो उनके मुख से आभार के शब्द निकले। यही सनातन की शक्ति है। बुराई का उत्तर बुराई से देना हमारी परंपरा नहीं है। हमारे लिए धर्म केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं, बल्कि आचरण का भी नाम है। इसी संदर्भ में उस साधु की कथा स्मरण आती है, जो नदी में डूबते बिच्छू को बार-बार बचाने का प्रयास कर रहा था। बिच्छू बार-बार उसे डंक मारता रहा, लेकिन साधु उसे बचाने से पीछे नहीं हटा। किसी ने पूछा—जब यह बार-बार डंक मार रहा है तो इसे क्यों बचाते हैं?
साधु ने उत्तर दिया—
“डंक मारना बिच्छू का धर्म है और डूबते हुए को बचाना मेरा धर्म। जब वह अपना धर्म नहीं छोड़ रहा, तो मैं अपना धर्म कैसे छोड़ दूँ?”
यही वह जीवन-दृष्टि है, जिसमें दूसरे के आचरण से अपना धर्म निर्धारित नहीं होता।
सार्वभौमिक स्वीकार्यता
स्वामी विवेकानंद ने अपने वक्तव्य में कहा—
“I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance.”
यह वाक्य केवल हिंदू धर्म की प्रशंसा नहीं है। यह भारत की उस दार्शनिक दृष्टि का परिचय है, जो सत्य को अनेक दृष्टियों से ग्रहण करने की क्षमता रखती है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 164वें सूक्त की 46वीं ऋचा में कहा गया है—
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।”
अर्थात परम सत्य एक ही है, किंतु ज्ञानीजन उसे अपनी-अपनी दृष्टि और समझ के अनुसार विभिन्न नामों से पुकारते हैं।
यह केवल Tolerance नहीं है। यह Universal Acceptance है।अर्थात—मेरा धर्म भी सही हो सकता है और तुम्हारा भी। मेरा मार्ग भी सत्य की ओर ले जा सकता है और तुम्हारा भी। मेरे सही होने के लिए आपका गलत होना आवश्यक नहीं है। यही भारत की सभ्यतागत दृष्टि का वैशिष्ट्य है।
पश्चिम ने सुना भारत का स्वर
शिकागो में स्वामी विवेकानंद के भाषण का प्रभाव तत्काल दिखाई दिया। अगली सुबह अमेरिकी अखबारों के पन्ने उनके यशगान से भरे पड़े थे। New York Herald ने लिखा कि विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद सबसे महान वक्ता थे। उन्हें सुनने के बाद लगता है कि जिस देश में इतने विद्वान और बुद्धिमान लोग रहते हैं, वहाँ धर्म प्रचारकों (Missionaries) को भेजना कितना मूर्खतापूर्ण है। The New York Critics ने लिखा कि कई विद्वानों के भाषण बहुत अच्छे थे, लेकिन इस हिंदू साधु के प्रभाव के सामने कोई टिक नहीं पाया। शिकागो में स्वामी विवेकानंद की सफलता केवल एक वक्ता की सफलता नहीं थी। यह उस भारत की वैचारिक उपस्थिति की पुनर्स्थापना थी, जिसे पश्चिमी दृष्टि ने लंबे समय तक अपने पूर्वाग्रहों के माध्यम से परिभाषित करने का प्रयास किया था। भारत ने वहां अपनी शक्ति तलवार के माध्यम से नहीं, विचार के माध्यम से दिखाई।
विवेकानंद : आध्यात्मिक चेतना से राष्ट्रचेतना तक
यदि कोई यह मानता है कि स्वामी विवेकानंद का योगदान केवल हिंदू धर्म की व्याख्या तक सीमित था और उनका राष्ट्रधर्म से कोई संबंध नहीं था, तो उसे इस विषय को थोड़ा और गहराई से देखने की आवश्यकता है।
उन साहित्यिक दस्तावेजों को पढ़िए, जिनमें अंग्रेजों ने स्वयं लिखा है कि 1897 के बाद ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध क्रांति करने वाले जिन भी स्वतंत्रता सेनानियों को उन्होंने गिरफ्तार किया, उनमें से अधिकांश के पास स्वामी जी की तस्वीर या उनसे संबंधित साहित्य अवश्य पाया गया। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज को केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं दिया। उन्होंने भारतीय आत्मविश्वास को जगाया। उन्होंने उस राष्ट्र को अपनी शक्ति पहचानने का आह्वान किया, जिसे पराधीनता ने आत्मविस्मृति की ओर धकेल दिया था। उनका संदेश था—अपने भीतर की शक्ति को पहचानो। अपने अतीत से जुड़ो। अपनी संस्कृति पर विश्वास करो। और अपने राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को समझो। इसीलिए स्वामी विवेकानंद का शिकागो केवल एक धार्मिक सम्मेलन की घटना नहीं है। वह भारतीय आत्मबोध के आधुनिक इतिहास का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
ज्ञान की वह ज्योति
महान अमेरिकी विद्वान John Henry Wright की रचनाओं में भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि एक अकेले स्वामी विवेकानंद का ज्ञान अमेरिका के सभी प्रोफेसरों के संयुक्त ज्ञान से भी अधिक था—
“More than the sum total of all the knowledge of American professors.”
यह कथन केवल एक व्यक्ति की विद्वत्ता का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। इसके पीछे उस भारत की ज्ञान-परंपरा का आत्मविश्वास भी था, जो आधुनिकता से संवाद करते हुए भी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ती। स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम को भारत से परिचित कराया, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने भारत को स्वयं अपने सामर्थ्य का बोध कराया।
9/11 को फिर से याद करें
आज 9/11 की स्मृति हमारे सामने आती है तो आतंकवाद और विध्वंस का चित्र उभरता है।
लेकिन उसी तारीख की एक दूसरी स्मृति भी है—शिकागो की।
एक ओर विध्वंस की स्मृति है, दूसरी ओर संवाद की।
एक ओर आतंक की स्मृति है, दूसरी ओर विश्वबंधुत्व की।
एक ओर मृत्यु का भय है, दूसरी ओर मानवता के प्रति विश्वास का उद्घोष।
इसलिए अब 9/11 को केवल न्यूयॉर्क के लिए नहीं, शिकागो के लिए भी याद करना होगा।
विध्वंस के लिए नहीं, विश्वशांति के लिए।
आतंकवाद के लिए नहीं, सनातन संवाद के लिए।
और आज के बाद 9/11 को केवल लादेन के लिए नहीं, नरेंद्र के लिए भी याद करना होगा।
क्योंकि 9/11 केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।
यह उस भारत के विश्वघोष का दिन है, जब एक युवा संन्यासी शिकागो के मंच पर खड़ा हुआ और उसने संसार को बताया कि भारत की शक्ति उसकी भौतिक संपदा से कहीं अधिक उसकी आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान-परंपरा और मानवता को एक परिवार के रूप में देखने वाली दृष्टि में निहित है। 11 सितंबर 1893 को शिकागो से उठी वह आवाज आज भी हमसे पूछती है—क्या हम उस भारत को पहचानते हैं, जिसकी आवाज ने संसार को ‘भाइयों और बहनों’ कहकर संबोधित किया था? यदि पहचानते हैं, तो उस भारत को केवल स्मरण करना पर्याप्त नहीं है। उस भारत को अपने आचरण में उतारना होगा। उसकी सहिष्णुता को जीना होगा।
उसकी स्वीकार्यता को समझना होगा। उसके विश्वबंधुत्व को आत्मसात करना होगा। और अपनी सनातन जड़ों से जुड़कर विश्व के साथ संवाद करना होगा। तभी 9/11 की स्मृति भय से निकलकर बोध बनेगी। तभी शिकागो की वह पुकार हमारे वर्तमान में भी जीवित होगी।
और तभी हम कह सकेंगे—
9/11 : सनातन का विश्वघोष।
उठो जवान, देश की वसुंधरा पुकारती,
ये देश है पुकारता, पुकारती मां भारती।
(लेखक, अभाविप केंद्रीय सचिवालय कार्य सचिव हैं एवं ये उनके निजी विचार हैं।)
