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Home पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा : आवरण का अनावरण

अजीत कुमार सिंह by सौरभ शर्मा
April 30, 2020
in पुस्तक समीक्षा, विविधा
पुस्तक समीक्षा : आवरण का अनावरण

aavaran

आवरण एक ऐसा उपन्यास है जिसके लेखक कर्नाटक के श्री एस एल भैरप्पा हैं। यह उपन्यास मूलतः कन्नड़ भाषा में 2007 में लिखा गया था,  लेकिन उसके बाद इसके अनुवाद हिंदी,  मराठी,  गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओं में हो चुके हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित होने के पश्चात भी आवरण उपन्यास इतना प्रसिद्ध हो चुका था कि,  इसके तीन संस्करण – छपने के पहले ही पूरी तरीके से बिक चुके थे।

आवरण की कथा को, पुराणों की कथा कि तरह लिखा गया है। जिसमें हर कथा के भीतर एक कथा है, जैसे रूसी गुड़िया होती है। आवरण भारतीय इतिहास के सत्य को उजागर करने वाला उपन्यास है। लेखक ने इसे लिखने के पहले 4 वर्षों तक लगातार मूल श्रोतों से, भारतीय इतिहास का अध्ययन किया। लेखक ने 136 ऐतिहासिक पुस्तकों के संदर्श उपन्यास में ही दिए हुए हैं। यह उपन्यास ही नहीं बल्कि एक शोध ग्रंथ के रूप में भी पाठक के मन में बहुत ही गहरा भाव और विलक्षण मंथन उत्पन्न करने वाली कृति प्रतीत होता। श्री भैयरप्पा ने दर्शन – साहित्य और ऐतिहासिक शोध का एक अद्भुत उदाहरण अपने उपन्यास में दिखाया है।

मुझे कहानी के मुख्यता तीन पात्र सबसे अहम दिखें जिनमें सबसे पहली हैं कहानी की नायिका रज़िया उर्फ लक्ष्मी गौड़ा,  दूसरे लक्ष्मी के पिता नरसिम्हा गौड़ा,  जो आदर्श गांधीवादी है  और उपन्यास में भारतीय सभ्यता का प्रतिनिधत्व कर रहें हैं,  तीसरा पात्र है प्रोफेसर शास्त्री का,  जो समाज को हर चीज अपने आईने से दिखाता है,  जिसे आज बुद्धिजीवी समाज कहा जाता है। प्रो शास्त्री जैसे लोग भारत के हर संस्थान और शैक्षिक परिसर में उपस्थिति हैं।

कहानी का आरंभ हम्पी (विजयनगर साम्राज्य) कि एक ठंडी शाम से होता है। जहां रज़िया अपने पति आमिर के साथ हम्पी के इतिहास पर एक डॉक्यूमेट्री स्क्रिप्ट लिखने और शूट करने के सरकारी योजना को पूर्ण करने के लिए गई थी। रज़िया हम्पी में भगवान नरसिम्हा और शिव के टूटे हुए मंदिरों और मूर्तियों को देखकर एक आत्मीय मंथन से भर जाती है। जो उसे बार-बार परेशान करते है, और वह आमिर द्वारा दिए जा रहे है मूर्ति विध्वंश के मार्क्सवादी ऐतिहासिक दृष्टिकोण को नकारती हैं। एक सुबह अचानक रज़िया (लक्ष्मी) को प्रो. शास्त्री से पता चलता है कि उसके पिता संसार में नहीं रहें। वह अपने गांव नरसापुरा पहुंचती हैं।

रज़िया के जीवन की पृष्ठभूमि कुछ ऐसी है। रज़िया जो पहले लक्ष्मी थी,  उसके पिता ने उसे शहर पढ़ने के लिए भेजा था। लक्ष्मी और आमिर दोनों प्रो. शास्त्री के शिष्य थे, शास्त्री के प्रगतिशीलता के विचार ने लक्ष्मी को अपना धर्म और पिता छोड़कर आमिर का मजहब कुबूल करना पड़ा,  लेकिन प्रगतिशील आमिर ने अपना मजहब नहीं छोड़ा। लक्ष्मी के पिता ने आमिर के धर्म परिवर्तन के लिए कहते हैं, लेकिन आमिर मना कर देता है, फिर भी लक्ष्मी आमिर से रजिया बन कर निकाह करती है। नरसिम्हा गौड़ा अपनी इकलौती बेटी से सारे संबध समाप्त कर देते है। लेकिन एक पिता का हृदय तार- तार हो गया था। वह सोचते थे बेटी किसी और धर्म में गई तो, उस धर्म में ऐसी क्या बात है? वह अपनी सारी जिम्मेदारियां और कार्य को बंद करते हुए, अपने आप को एक कमरे में बंद कर लेते हैं और पूरे इस्लाम का अध्ययन शुरू करते हैं। अपने पिता के मृत्यु के बाद जब रजिया घर पहुंची तो अठारह वर्ष हो चुके थे। रजिया ने पाया कि उसके पिता ने इस्लाम और इतिहास के अध्ययन के लिए एक पुस्तकालय बना लिया है। उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थीं, लेकिन अपने बुढ़ापे में उन्होंने अंग्रेज़ी सीखी ताकि वह उन किताबों का अध्ययन कर सकें जो कन्नड़ भाषा में उपलब्ध नहीं है। लक्ष्मी को उस पुस्तकालय में अनेकों लेखक की पुस्तकें मिलती हैं। वह उन सबका अध्ययन शुरू करती है।

 

वेदांत दर्शन में दो अवधारणा है “आवरण और विक्षेप”  सत्य पर पर्दा डालने को आवरण कहतें हैं, और असत्य के प्रचार को विक्षेप कहते हैं। लक्ष्मी को अध्ययन के समय प्रो. शास्त्री जैसे लोगों द्वारा फैलाए जा रहे विक्षेप का पता लगता है, सत्य पर फैले आवरण का अनावरण होता है। जिसे कोनार्ड एलस्ट ने कहा है “Negationism and history-distortion require a large-scale effort and a very strong grip on the media of information and education. As soon as the grip loosens, at least the most blatant of the negationist concoctions are bound to be exposed, and its propounders lose all credibility.”

यह कहानी रज़िया के वापस लक्ष्मी बनने की यात्रा है। यह कहानी भारत के सच्चे इतिहास के साथ वामपंथीयों द्वारा किए गए कुकृत्य की कहानी है। प्रो.शास्त्री जैसे लोगों ने देश  की जनता से उनका सच्चा इतिहास छिपा कर,  इतिहास का सबसे बड़ा पाप किया है। यह कहानी नरसिम्हा गौड़ा और एक पिता के रूप अपने संततियों के लिए तड़प रही सभ्यता की कहानी है।

आलोचकों ने उपन्यास की खूब आलोचना की है,  इसे बहुत ही कटू उपन्यास बताया है,  लेकिन एस एल भैरप्पा ने इसी उपन्यास में कहा है “यदि आपने सच बोलना तय कर लिया है तो, आवाज़ मीठी है या कड़वी इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता।”

पुस्तक का नाम : आवरण

लेखक : श्री एस एल भैरप्पा

प्रकाशक :  किताबघर प्रकाशन

कुल पृष्ठ : 295

(लेखक अभाविप मध्यभारत प्रांत के प्रांत सोशल मीडिया प्रमुख हैं।)

Tags: #ReadABookChallengeaavaranabvpabvp madhyabharatabvp voiceBook reviewmp
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