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Home लेख

जनसेवा को समर्पित भगिनी निवेदिता

अजीत कुमार सिंह by प्रिया शर्मा
October 28, 2020
in लेख
जनसेवा को समर्पित भगिनी निवेदिता

” जीते तो पशु पक्षी,कीड़े मकोड़े भी है परंतु जीवन उनका धन्य है जो समाज कल्याण के लिए समर्पित है ” ऐसे ही जीवन का पर्याय भगिनी निवेदिता भी रही। भगिनी निवेदिता का जन्म आयरिश परिवार में 28 अक्टूबर वर्ष 1867 को हुआ,बाल्यकाल से ही अति संवेदनशील स्वभाव और सेवा कार्यों में समर्पित मार्गरेट नोबल का लक्ष्य जनसेवा ही बन गया।

मार्गरेट का सम्पर्क स्वामी विवेकानंद से शिकागो के प्रसिद्ध प्रेरणादायक भाषण के कुछ वर्ष बाद हुआ।पहले से ही भारतीय संस्कृति की सूझ-बूझ होने के कारण मार्गरेट ने स्वामी जी के वचनो से प्रभावित होकर भारत देश की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।स्वामी जी के भारतीय महिलाओं की शिक्षा के महत्व के विषय में सुनकर महिला कल्याण हेतु कार्यों में पहले से ही रुचि रखने वाली मार्गरेट को एक दिशा मिली और स्वामी जी के संसार को बदलने के लिए स्वयं को तैयार करने के प्रेरक वचनो ने मार्गरेट को भारत जाने हेतु प्रोत्साहित किया।ब्रिटिश शासन की क्रूरता और उसके कारण द्वेष,ग़रीबी,उपेक्षा आदि बुराइयों से ग्रसित भारतीय समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने हेतु मार्गरेट वर्ष 1898 में कोलकाता आई और उसे उन्होंने अपनी कर्मभूमि बना लिया। समर्पण को देखते हुए मार्गरेट को उनके समर्पित भाव के अर्थ के अनुरूप निवेदिता नाम स्वामी विवेकानंद जी ने दिया।
सर्वप्रथम अपने सरल स्वभाव के कारण भगिनी निवेदिता ने महिलाओं के बीच में अपनी पहचान बना ली और काफ़ी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने अल्मोड़ा,मद्रास,कश्मीर आदि स्थानो के भ्रमण के उपरांत मिले अनुभव के आधार पर वर्ष 1898 में महिलाओं को शिक्षित करने का प्रण लिया और महिला पाठशाला आरंभ की जिसमें राष्ट्रप्रेम एवं विभिन्न कलाओं के विषय में शिक्षित किया गया।इस कार्य के प्रति कलकत्ता में लोगों ने निवेदिता को प्यार से सिस्टर निवेदिता नाम दिया।पाठशाला के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया की महिलाओं की शिक्षा से ही देश का कल्याण संभव है। साथ ही राष्ट्रप्रेम में समाहित मानव सेवा कार्य करने हेतु युवा पीढ़ी को त्याग,बलिदान,सेवा,भारतीय आध्यात्म आदि विषयों पर ज़ोर देने का आग्रह भी भगिनी निवेदिता का था।
जब कलकत्ता में वर्ष 1899 में प्लेग का प्रकोप हुआ और प्रतिदिन सैंकड़ों लोग मरने लगे तब भगिनी निवेदिता ने अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों के जीवन बचाने का संकल्प लिया और शौचालयों,गंदी नाली आदि की सफ़ाई करना आरंभ कर दिया जिससे अन्य युवक भी राहत कार्य में लग गए।साथ ही रोकथाम हेतु युवकों की सेवा कार्य समिति बनाने से लेकर रोगग्रस्त लोगों के उपचार तक सभी कार्य भगिनी निवेदिता ने अपने जनसेवा को समर्पित भाव से करते हुए समाज सेवा की शिक्षा व्यावहारिक रूप में दी।
सेवा कार्य के साथ साथ अस्त्र,शस्त्र दोनो के महत्व को समझते हुए भगिनी निवेदिता ने स्वामी जी को दिए वचन के अनुरूप भारत को स्वतंत्र कराने हेतु अपना क्रांतिकारी योगदान दिया।लेखन कार्य से जनजागरण करने के साथ साथ भगिनी निवेदिता ने अपनी प्रभावशाली वाणी से वर्ष 1905 मे बंगाल विभाजन के विरोध में आयोजित जनसभा में सिंहनी की तरह गर्जना की। भारतीय जनमानस के प्रति संवेदनशीलता दर्शाते हुए अंग्रेज़ो द्वारा भारतीयों के शोषण व दमन को देखते हुए भारत की स्वतंत्रता को अपने जीवन का परम ध्येय बना लिया। भगिनी निवेदिता ने जनमानस को संबोधित करते हुए कहाँ की जब तक भारत को स्वाधीनता प्राप्त नही होती तब तक क्रूरतापूर्वक व्यवहार भारतीयों के साथ होता रहेगा।
अतः अंग्रेज होने के बावजूद भी रचनात्मक एवं क्रांतिकारी स्वभाव के समावेश के साथ निवेदिता ने क्रूर ब्रिटिश शासक के ख़िलाफ़ वन्दे मातरम् गीत की ध्वनि से स्कूल स्तर से लेकर घरों तक को राष्ट्रीयता का केंद्र बना लिया।खादी वस्त्र अपनाने से लेकर चरखा चलाना आदि सभी माध्यमों से भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार हेतु निवेदिता ने कलाकारों की आर्थिक मदद भी की।महापुरुषों के साथ से प्रभावित होकर भगिनी निवेदिता ने अनुशीलन समिति,क्रांतिकारी समिति,विवेकानंद समिति में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई,इसके साथ ही अंग्रेज़ो से लड़ने हेतु आत्मसुरक्षा की दृष्टि से बम बनाने की कला भी अन्य क्रांतिकारियो को सिखाई।
जीवन के आख़िरी समय में रोग शैय्या पर होते हुए भी निवेदिता ने दि मिस्टर, क्रेडल टेल्ज़ आफ हिंदूइज़्म आदि ग्रंथो की रचना की।लेखन कार्य से मिलने वाली राशि को भी आख़िरी समय में निवेदिता ने बेलूर मठ को देश में महिलाओं को राष्ट्रवाद की शिक्षा देने हेतु दान दे दिया।अतः भगिनी निवेदिता ने अपने जीवन को पूर्णतः आख़िरी समय तक भारत की सेवा में लगा दिया और भारत को स्वतंत्र करने हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। वह जन्मी बेशक विदेश में थी परंतु भारत के कण कण से प्यार करने वाली मार्गरेट ने भारत में जनसेवा करते हुए लोगों के दिलो में अपना अलग स्थान उस समय में बनाया जब गोरों की क्रूरता के चलते जनमानस गोरों से बात करने में भी कतराते थे।
अपने प्राण त्यागते हुए भगिनी निवेदिता ने भारत के लिए कहाँ “मुझे उज्ज्वल भविष्य की क़िरणे दिखाई दे रही है”।अतः निवेदिता की सकारात्मकता सभी भारतीयों को देश के सुनहरे भविष्य में आहुति देने हेतु प्रेरित करती है।भारत के लिए अपना असीम योगदान देने वाली महान वीरांगना,साहसी,सेविका,आदर्श मातृशक्ति की प्रतिमूर्ति भगिनी निवेदिता के जनसेवा में किए गए कार्य सदा ही वर्तमान भारत के नागरिक एवं भविष्य में आने वाली भारत की पीढ़ी के लिए प्रेरणाश्रोत रहेंगे।

(लेखिका अभाविप दिल्ली प्रान्त की प्रांत सह छात्रा प्रमुख हैं।)

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